जब-जब भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन होता है, तब गोकुल की वह अद्भुत दुनिया आंखों के सामने आ जाती है, जहां नंद बाबा के घर नन्हे कान्हा अपनी बाल लीलाओं से सभी का मन मोह रहे थे। लेकिन इसी के साथ एक दूसरी कहानी भी चल रही थी।
मथुरा का राजा कंस भय से परेशान था।
उसे आकाशवाणी के माध्यम से पहले ही पता चल चुका था कि देवकी का आठवां पुत्र ही उसकी मृत्यु का कारण बनेगा। यही कारण था कि श्रीकृष्ण के जन्म के बाद कंस की चिंता और बढ़ गई थी। वह किसी भी कीमत पर उस बालक को ढूंढना और समाप्त करना चाहता था।
कंस ने कई राक्षसों को कृष्ण को मारने के लिए भेजा। इन्हीं में से एक थी पूतना।
लेकिन पूतना केवल एक साधारण राक्षसी नहीं थी।
उसके पीछे एक ऐसी कथा बताई जाती है, जो उसे भगवान श्रीकृष्ण से एक विचित्र संबंध में जोड़ देती है।
कहा जाता है कि पिछले जन्म में पूतना एक राजकन्या थी। उसका नाम था रत्नमाला।
वह राजा बलि की पुत्री थी।
एक समय उसके मन में भगवान वामन को देखकर ऐसा मातृत्व जागा था कि वह उन्हें अपना पुत्र बनाकर गोद में खिलाना चाहती थी। लेकिन उसी घटना के दौरान उसके मन में एक दूसरा भाव भी उत्पन्न हुआ, जो आगे चलकर उसके अगले जन्म की दिशा तय करने वाला था।
तो आखिर रत्नमाला कौन थी?
उसने भगवान वामन को देखकर ऐसा क्या सोचा था?
और कैसे वही राजकन्या अगले जन्म में पूतना राक्षसी बनी?
आइए, इस पूरी कथा को शुरुआत से जानते हैं।
जब राजा बलि के महल में पहुंचे भगवान वामन
यह कथा उस समय की बताई जाती है जब राजा बलि का राज्य था।
राजा बलि असुरों के राजा थे, लेकिन उनके बारे में यह भी कहा जाता है कि वे दानी और उदार स्वभाव के थे। उनकी दानशीलता की चर्चा दूर-दूर तक थी।
एक दिन उनके यहां भगवान वामन एक छोटे बालक के रूप में पहुंचे।
वामन देव का स्वरूप अत्यंत सुंदर और मनमोहक था।
राजा बलि के महल में मौजूद लोग उन्हें देखकर आकर्षित हो रहे थे।
उसी समय राजा बलि की पुत्री रत्नमाला की नजर भी भगवान वामन पर पड़ी।
वामन देव के उस बाल स्वरूप को देखकर रत्नमाला के मन में अचानक एक अलग ही भावना जाग उठी।
उसके मन में मातृत्व का भाव उमड़ आया।
वह मन ही मन सोचने लगी—
काश, मेरे भी ऐसा ही सुंदर पुत्र होता।
वह कल्पना करने लगी कि यदि ऐसा बालक उसका पुत्र होता, तो वह उसे अपनी गोद में उठाती, अपने हृदय से लगाती और उसे प्रेम से दूध पिलाती।
उसके मन में भगवान वामन को पुत्र की तरह दुलारने की इच्छा पैदा हो गई।
कथा के अनुसार, भगवान वामन उसके मन की इस इच्छा को जान गए।
और उन्होंने उसे “तथास्तु” कह दिया।
लेकिन रत्नमाला की कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई।
क्योंकि कुछ ही समय बाद वही घटना एक ऐसा मोड़ लेने वाली थी, जिसने उसके अगले जन्म की पूरी दिशा बदल दी।

वामन देव ने राजा बलि से मांगे तीन पग
भगवान वामन राजा बलि के पास आए थे।
उन्होंने राजा बलि से दान में तीन पग भूमि मांगी।
राजा बलि ने उनकी इच्छा स्वीकार कर ली।
लेकिन भगवान वामन कोई साधारण बालक नहीं थे।
उन्होंने अपने विराट स्वरूप का विस्तार किया।
एक पग में उन्होंने पृथ्वी को नाप लिया।
दूसरे पग में आकाश और अन्य लोकों को नाप लिया।
अब उनके सामने तीसरे पग के लिए स्थान नहीं बचा था।
राजा बलि समझ चुके थे कि उनके सामने स्वयं भगवान हैं।
उन्हें अपनी स्थिति का बोध हुआ और उन्होंने भगवान वामन के सामने अपना सिर झुका दिया।
उन्होंने अपनी भूल स्वीकार की और भगवान से क्षमा मांगी।
भगवान वामन ने राजा बलि की भक्ति और समर्पण को स्वीकार किया।
लेकिन रत्नमाला दूर से यह पूरा दृश्य देख रही थी।
उसकी आंखों के सामने उसके पिता का झुकना था।
जिस राजा के वैभव और शक्ति को उसने देखा था, वही राजा अब भगवान वामन के सामने अपना सिर झुका चुका था।
रत्नमाला को यह अपने पिता का अपमान प्रतीत हुआ।
उसके मन में पहले जो प्रेम और मातृत्व का भाव था, वह अचानक क्रोध में बदल गया।
और यही वह क्षण था, जिसने उसकी कथा को एक नया मोड़ दिया।
एक ही मन में जन्मे दो भाव
रत्नमाला भगवान वामन के बाल स्वरूप से प्रभावित हुई थी।
उसने मन में इच्छा की थी कि ऐसा ही पुत्र उसे मिले।
वह उसे अपनी गोद में लेकर दूध पिलाना चाहती थी।
भगवान ने उसके उस भाव को जानकर तथास्तु कहा था।
लेकिन अब वही रत्नमाला क्रोधित थी।
उसे लगा कि भगवान वामन ने उसके पिता का अपमान किया है।
क्रोध में उसके मन के भीतर एक बिल्कुल विपरीत विचार आया।
कथा के अनुसार, उसने मन ही मन कहा कि यदि ऐसा मेरा पुत्र होता, तो वह उसे विष पिला देती।
भगवान वामन उसके इस भाव से भी अनजान नहीं थे।
जिस प्रकार उन्होंने उसके पहले भाव को जाना था, उसी प्रकार उन्होंने उसके क्रोध से उत्पन्न इस इच्छा को भी जान लिया।
और कथा के अनुसार, भगवान ने इस भाव के लिए भी “तथास्तु” कह दिया।
यहीं रत्नमाला के दोनों भाव एक साथ जुड़ गए।
एक तरफ उसके मन में भगवान वामन को पुत्र की तरह प्रेम करने और दूध पिलाने की इच्छा थी।
दूसरी ओर उसी बालक को विष पिलाने की इच्छा भी उसके मन में आ चुकी थी।
भगवान ने दोनों भावों को स्वीकार कर लिया।
और यही दोनों इच्छाएं उसके अगले जन्म से जुड़ी कथा का आधार बनीं।

अगले जन्म में रत्नमाला बनी पूतना
समय बीता।
रत्नमाला का वह जन्म समाप्त हुआ।
कथा के अनुसार, भगवान वामन के दिए हुए दोनों “तथास्तु” के कारण अगले जन्म में उसने पूतना राक्षसी के रूप में जन्म लिया।
अब वही मातृत्व की इच्छा और वही विष पिलाने की इच्छा एक विचित्र रूप में उसके जीवन से जुड़ चुकी थी।
पूतना का स्वरूप राक्षसी का था।
वह कंस की विश्वासपात्र थी और उसके आदेश पर कार्य करती थी।
जब कंस को यह भय सताने लगा कि देवकी का आठवां पुत्र कहीं जीवित न हो और उसकी मृत्यु का कारण न बन जाए, तब उसने उस बालक को खोजने के लिए अनेक प्रयास किए।
कंस ने उन बच्चों को भी निशाना बनाने का आदेश दिया जो उसके अनुसार उस भविष्यवाणी से संबंधित हो सकते थे।
इसी क्रम में उसने पूतना को भी भेजा।
पूतना को आदेश मिला कि वह बच्चों को समाप्त करे।
अब पूतना गोकुल की ओर बढ़ चली।
लेकिन उसे पता नहीं था कि जिस बालक को वह मारने जा रही है, वही बालक उसके पिछले जन्म की दोनों इच्छाओं को पूरा करने वाला था।
सुंदर स्त्री का रूप धारण करके गोकुल पहुंची पूतना
पूतना मायावी रूप धारण करने में सक्षम थी।
वह अपने वास्तविक राक्षसी स्वरूप में गोकुल नहीं जा सकती थी।
इसलिए उसने एक सुंदर स्त्री का रूप धारण किया।
उसका रूप इतना आकर्षक था कि उसे देखकर किसी को भी संदेह नहीं हुआ।
वह गोकुल पहुंची और धीरे-धीरे उस स्थान तक पहुंच गई जहां बाल कृष्ण थे।
गोकुल में उस समय श्रीकृष्ण एक सामान्य बालक की तरह अपनी बाल लीलाएं कर रहे थे।
किसी को अंदाजा नहीं था कि उनके सामने जो स्त्री खड़ी है, उसके मन में क्या योजना है।
पूतना की नजर कृष्ण पर पड़ी।
उसने उन्हें उठाया।
वह उन्हें दूध पिलाने लगी।
लेकिन यहां एक बड़ा रहस्य था।
पूतना ने अपने स्तनों पर विष लगाया हुआ था।
उसका उद्देश्य था कि दूध पीते ही बाल कृष्ण की मृत्यु हो जाए।
लेकिन पूतना भूल गई थी कि वह किसे अपना शिकार बनाने आई है।
यह कोई साधारण बालक नहीं था।
यह स्वयं भगवान श्रीकृष्ण थे।

कृष्ण ने पूतना को पहचान लिया
पूतना ने बाल कृष्ण को दूध पिलाना शुरू किया।
लेकिन भगवान कृष्ण उसके वास्तविक स्वरूप और उसके मन के उद्देश्य को पहले ही जान चुके थे।
जिसे पूतना एक साधारण बालक समझकर अपने पास लाई थी, वह उसके सामने स्वयं भगवान थे।
कृष्ण ने दूध पीना शुरू किया।
लेकिन कथा के अनुसार, उन्होंने केवल उसका दूध ही नहीं पिया।
उन्होंने पूतना के भीतर मौजूद उस दुष्ट शक्ति को भी समाप्त कर दिया, जिसके बल पर वह गोकुल आई थी।
पूतना की शक्ति समाप्त होने लगी।
उसका वास्तविक स्वरूप सामने आने लगा।
जिस सुंदर स्त्री के रूप में वह गोकुल आई थी, वह एक विशाल राक्षसी के रूप में प्रकट हुई।
उसका शरीर विशाल हो गया और वह धरती पर गिर पड़ी।
गोकुल के लोग यह देखकर स्तब्ध रह गए।
उन्हें समझ में आ गया कि यह कोई साधारण स्त्री नहीं थी।
वह एक राक्षसी थी, जो बाल कृष्ण को मारने के लिए आई थी।
लेकिन कृष्ण ने उसका वध कर दिया।
इस प्रकार पूतना का अंत भगवान श्रीकृष्ण के हाथों हुआ।

पूतना की मृत्यु के साथ पूरी हुई उसकी दोनों इच्छाएं
यहीं इस कथा का सबसे अनोखा भाग सामने आता है।
पिछले जन्म में रत्नमाला ने दो बिल्कुल विपरीत इच्छाएं की थीं।
पहली इच्छा थी—
वह भगवान वामन जैसे सुंदर बालक को अपना पुत्र बनाकर उसे गोद में लेकर दूध पिलाए।
दूसरी इच्छा क्रोध में उत्पन्न हुई थी—
यदि ऐसा पुत्र मिले तो वह उसे विष पिला दे।
भगवान ने दोनों इच्छाओं को “तथास्तु” कह दिया था।
अगले जन्म में वही रत्नमाला पूतना बनी।
वह श्रीकृष्ण के पास पहुंची।
उसने उन्हें अपनी गोद में लिया।
उन्हें दूध पिलाया।
लेकिन दूध में विष मिला हुआ था।
और अंततः श्रीकृष्ण ने उसके प्राण हर लिए।
इस प्रकार कथा के अनुसार, उसकी दोनों इच्छाएं एक ही घटना में पूरी हो गईं।
उसने भगवान को बालक के रूप में गोद में लिया और उन्हें दूध पिलाया।
और जिस विष को पिलाने की इच्छा उसने पिछले जन्म में की थी, वह भी उसी घटना का हिस्सा बन गई।
लेकिन सबसे बड़ी बात यह थी कि उसका अंत भगवान श्रीकृष्ण के हाथों हुआ।
कथा के अनुसार, भगवान के हाथों मृत्यु होने के कारण पूतना जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो गई।
पूतना के अंत में छिपा है एक गहरा संदेश
पूतना की कथा केवल एक राक्षसी के वध की कहानी नहीं है।
इस कथा में एक ऐसा प्रसंग आता है, जहां एक ही व्यक्ति के मन में दो बिल्कुल विपरीत भाव उत्पन्न होते हैं।
एक तरफ प्रेम था।
दूसरी तरफ क्रोध।
एक तरफ वह भगवान को अपना पुत्र बनाकर उन्हें दूध पिलाना चाहती थी।
दूसरी तरफ उसी भगवान के प्रति क्रोध में उसने विष पिलाने की इच्छा कर दी।
और कथा के अनुसार, भगवान ने दोनों भावों को स्वीकार किया।
अगले जन्म में दोनों इच्छाएं पूरी हुईं।
लेकिन अंत में भगवान श्रीकृष्ण ने पूतना का वध करके उसे मुक्ति प्रदान की।
यही इस कथा का सबसे भावुक पक्ष है।
जिस राक्षसी का उद्देश्य कृष्ण को मारना था, वही अंततः भगवान के हाथों मृत्यु पाकर मुक्त हो गई।
कृष्ण की बाल लीला में पूतना का प्रसंग इसलिए भी विशेष माना जाता है, क्योंकि इसमें भगवान की शक्ति के साथ-साथ उनकी कृपा का भी भाव दिखाई देता है।
पूतना जिस उद्देश्य से गोकुल आई थी, वह उद्देश्य पूरा नहीं हुआ।
वह कृष्ण को मारने आई थी।
लेकिन कृष्ण ने ही उसका अंत कर दिया।
और मान्यता के अनुसार, उसके पिछले जन्म के उन दोनों भावों को भी पूर्ण कर दिया, जो उसके मन में भगवान वामन को देखकर उत्पन्न हुए थे।
आखिर पूतना कौन थी?
तो अब उस सवाल का जवाब मिल जाता है, जिससे यह पूरी कथा शुरू हुई थी।
पूतना कौन थी?
कथा के अनुसार, पूतना अपने पिछले जन्म में राजा बलि की पुत्री रत्नमाला थी।
भगवान वामन को देखकर उसके मन में मातृत्व का भाव जागा था।
उसने इच्छा की थी कि भगवान वामन जैसे सुंदर बालक को वह अपना पुत्र बनाकर दूध पिलाए।
भगवान ने उसके इस भाव को जानकर “तथास्तु” कहा।
लेकिन जब उसने अपने पिता राजा बलि को वामन देव के सामने समर्पित होते देखा, तो उसके मन में क्रोध उत्पन्न हो गया।
उसने भगवान को विष पिलाने की इच्छा की।
भगवान ने उस भाव को भी जान लिया और कथा के अनुसार उसे भी “तथास्तु” कह दिया।
अगले जन्म में रत्नमाला पूतना बनी।
कंस के आदेश पर वह गोकुल पहुंची।
सुंदर स्त्री का रूप धारण करके उसने बाल कृष्ण को दूध पिलाने का प्रयास किया।
लेकिन कृष्ण ने उसे पहचान लिया और उसका वध कर दिया।
इस प्रकार उसके जीवन की दोनों इच्छाएं एक ही घटना में पूरी हुईं।
और भगवान श्रीकृष्ण के हाथों मृत्यु प्राप्त करके, कथा के अनुसार, पूतना जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो गई।
यही है पूतना की वह कथा, जो उसके राक्षसी रूप से कहीं पहले शुरू होती है।
जय श्रीकृष्ण।







