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तुलसीदास जी ने हनुमान जी के कौन से मन्दिर स्थापित किये हैं

हनुमान मंदिरों की स्थापना

काशी… जिसे भगवान शिव की नगरी और मोक्ष की नगरी कहा जाता है।

गंगा के पवित्र तट पर बसी यह नगरी जितनी प्राचीन है, उतनी ही रहस्यमयी और आध्यात्मिक भी मानी जाती है। काशी की गलियों में कदम-कदम पर कोई न कोई मंदिर दिखाई देता है। कहीं भगवान शिव विराजमान हैं, तो कहीं माता शक्ति का स्वरूप दिखाई देता है। लेकिन काशी में भगवान हनुमान के भी अनेक प्राचीन मंदिर हैं, जिनसे अलग-अलग मान्यताएं और कथाएं जुड़ी हुई हैं।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि काशी के कई प्रसिद्ध हनुमान मंदिरों का संबंध गोस्वामी तुलसीदास जी से जोड़ा जाता है?

वही तुलसीदास जी, जिन्होंने भगवान श्रीराम की भक्ति में रामचरितमानस जैसे महान ग्रंथ की रचना की।

कहा जाता है कि तुलसीदास जी का काशी से गहरा संबंध था। उन्होंने यहां साधना की, श्रीराम के नाम का जाप किया और भगवान हनुमान की उपासना भी की। काशी में उनसे जुड़े कई स्थान आज भी श्रद्धा के केंद्र हैं।

इनमें संकट मोचन हनुमान मंदिर, बाल हनुमान मंदिर, तुलसी घाट के गुफा वाले हनुमान, कोड़िया हनुमान मंदिर और मनसा पूर्ण महामृत्युंजय हनुमान मंदिर प्रमुख रूप से बताए जाते हैं।

हर मंदिर की अपनी अलग कथा है।

तो आइए, काशी की गलियों से होते हुए उन हनुमान मंदिरों की यात्रा पर चलते हैं, जिनका संबंध गोस्वामी तुलसीदास जी की भक्ति और साधना से जोड़ा जाता है।

संकट मोचन मंदिर से शुरू होती है काशी के हनुमान मंदिरों की कथा

काशी के दक्षिणी क्षेत्र लंका में स्थित संकट मोचन हनुमान मंदिर देशभर में प्रसिद्ध है।

आज यहां दूर-दूर से श्रद्धालु भगवान हनुमान के दर्शन करने आते हैं। मंगलवार और शनिवार के दिन मंदिर में विशेष भीड़ देखने को मिलती है।

लेकिन इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता केवल इसकी प्रसिद्धि नहीं है।

इसका संबंध सीधे गोस्वामी तुलसीदास जी की साधना से जोड़ा जाता है।

मान्यता के अनुसार, तुलसीदास जी की भक्ति और तप से यहां भगवान हनुमान का दिव्य विग्रह प्रकट हुआ। इसी कारण इस प्रतिमा को स्वयंभू स्वरूप के रूप में भी माना जाता है।

हनुमान जी की यह प्रतिमा भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करती है।

कहा जाता है कि हनुमान जी की दक्षिण भुजा भक्तों को अभय प्रदान करने की मुद्रा में है, जबकि उनकी बाईं भुजा हृदय के पास स्थित है।

उनके नेत्रों के संबंध में भी मान्यता है कि वे अपने भक्तों पर निरंतर कृपा दृष्टि बनाए रखते हैं।

यह स्थान पहले मंदिर के वर्तमान स्वरूप में नहीं था। कथा के अनुसार, शुरुआत में यह स्थान एक छोटे से स्वरूप में दिखाई देता था, जिसे बाद में मंदिर के रूप में स्थापित किया गया।

समय के साथ यहां भव्य मंदिर का स्वरूप विकसित हुआ और आज यह काशी के सबसे प्रसिद्ध हनुमान मंदिरों में गिना जाता है।

हनुमान मंदिरों की स्थापना

बाल हनुमान मंदिर और तुलसीदास जी की साधना

काशी के उत्तर दिशा में हनुमान फाटक के पास बाल हनुमान का एक प्रसिद्ध मंदिर बताया जाता है।

इस मंदिर में भगवान हनुमान का बाल स्वरूप विराजमान है।

कथा के अनुसार, गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस स्थान पर बाल हनुमान के विग्रह की स्थापना की थी।

यह केवल मंदिर की स्थापना तक सीमित नहीं रहा।

कहा जाता है कि तुलसीदास जी ने कुछ समय यहां रहकर भगवान श्रीराम की भक्ति की और श्रीरामचरितमानस के कुछ कांडों की रचना भी इसी स्थान से जुड़ी हुई बताई जाती है।

कल्पना कीजिए उस समय की…

काशी की शांत गलियां।

पास ही गंगा की धारा।

और एक साधक अपने सामने भगवान श्रीराम और हनुमान का स्मरण करते हुए लगातार लेखन और साधना में लीन है।

तुलसीदास जी के लिए भगवान हनुमान केवल आराध्य नहीं थे, बल्कि श्रीराम तक पहुंचने के मार्ग के महत्वपूर्ण माध्यम भी माने जाते थे।

इसीलिए काशी में उनके द्वारा स्थापित हनुमान मंदिरों की परंपरा को भक्त विशेष श्रद्धा से देखते हैं।

बाल स्वरूप में विराजमान हनुमान जी की छवि भक्तों को विशेष रूप से आकर्षित करती है।

उनका यह रूप हमें उस बाल हनुमान की याद दिलाता है, जो सूर्य को फल समझकर उसे निगलने के लिए आकाश में उड़ गए थे।

हनुमान मंदिरों की स्थापना

तुलसी घाट के गुफा वाले हनुमान की रहस्यमयी कथा

काशी के गंगा तट पर स्थित तुलसी घाट का नाम ही गोस्वामी तुलसीदास जी की याद दिलाता है।

यही वह स्थान माना जाता है जहां तुलसीदास जी ने लंबे समय तक साधना की।

गंगा की धारा के किनारे बैठकर श्रीराम नाम का जाप करना और भगवान की भक्ति में लीन रहना उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा था।

इसी क्षेत्र में भगवान हनुमान का एक विशेष स्वरूप भी स्थापित है, जिसे गुफा वाले हनुमान जी के नाम से जाना जाता है।

कहा जाता है कि यहां भगवान हनुमान बाल रूप में प्रकट हुए थे।

दक्षिणमुखी होने के कारण इस स्वरूप को विशेष प्रतापी माना जाता है।

मंदिर के क्षेत्र में भगवान हनुमान के अन्य विग्रह भी मौजूद बताए जाते हैं और भक्त उनके दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं।

लेकिन तुलसी घाट की विशेषता केवल हनुमान मंदिर तक सीमित नहीं है।

यह पूरा स्थान गोस्वामी तुलसीदास जी की साधना से जुड़ा माना जाता है।

यहीं उनकी चरण पादुकाओं से जुड़ी स्मृतियां, नाव और मानस की पांडुलिपियों से संबंधित परंपराएं भी बताई जाती हैं।

यह स्थान चार सौ वर्ष से अधिक पुराना तपोवन बताया जाता है।

इसलिए जब कोई श्रद्धालु यहां पहुंचता है, तो वह केवल मंदिर के दर्शन नहीं करता, बल्कि उस भूमि को भी प्रणाम करता है जिसे तुलसीदास जी की साधना स्थली के रूप में याद किया जाता है।

हनुमान मंदिरों की स्थापना

कोड़िया हनुमान मंदिर की कथा

अब बात करते हैं काशी के एक ऐसे हनुमान मंदिर की, जिसकी कथा बाकी मंदिरों से बिल्कुल अलग है।

यह है कोड़िया हनुमान मंदिर

यह मंदिर कर्णघंटा क्षेत्र से जुड़ा हुआ बताया जाता है।

कथा के अनुसार, लगभग चार सौ वर्ष पहले यहां वेदव्यास मठ हुआ करता था और इसी स्थान से कोड़िया हनुमान जी की मूर्ति जुड़ी हुई है।

इस मंदिर से जुड़ी एक रोचक मान्यता भगवान हनुमान के एक विशेष रूप से संबंधित है।

कहा जाता है कि एक समय भगवान हनुमान कुष्ठ रोगी के भेष में कथा सुनने के लिए यहां आए थे।

उन्होंने स्वयं को एक साधारण और पीड़ित व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया।

इसी घटना की स्मृति में यहां हनुमान जी के इस स्वरूप को विशेष महत्व दिया जाता है।

स्थानीय मान्यता के अनुसार, जो व्यक्ति कुष्ठ रोग से पीड़ित होकर यहां अपनी समस्या लेकर आता है और भगवान हनुमान से प्रार्थना करता है, उसकी मनोकामना पूरी होती है और उसे रोग से मुक्ति मिलने की आशा रहती है।

यही विश्वास इस मंदिर को भक्तों के लिए विशेष बनाता है।

लोग अपनी परेशानियां लेकर यहां आते हैं।

हनुमान जी के सामने अपनी बात रखते हैं।

और विश्वास करते हैं कि संकट मोचन उनकी पुकार अवश्य सुनेंगे।

हनुमान मंदिरों की स्थापना

मनसा पूर्ण महामृत्युंजय हनुमान मंदिर

काशी में हनुमान जी के जिन मंदिरों का संबंध विशेष मनोकामनाओं से जोड़ा जाता है, उनमें मनसा पूर्ण महामृत्युंजय हनुमान मंदिर का भी उल्लेख मिलता है।

यह मंदिर प्रह्लाद घाट क्षेत्र में स्थित बताया जाता है।

यहां हनुमान जी का पूर्वमुखी स्वरूप माना जाता है।

भक्तों के बीच मान्यता है कि यहां भगवान हनुमान के दर्शन और पूजा करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

इसी परिसर से भगवान महादेव का मंदिर भी जुड़ा हुआ है और महामृत्युंजय हनुमान का स्वरूप भी यहां विशेष श्रद्धा का विषय है।

हनुमान जी और महादेव की उपासना का यह संबंध भी भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है।

क्योंकि हनुमान जी को भगवान शिव का अंश या रुद्रावतार मानने की परंपरा भी हिंदू धार्मिक मान्यताओं में मिलती है।

इसलिए काशी जैसे शिव की नगरी में हनुमान जी के ऐसे मंदिरों का होना अपने आप में भक्तों के लिए विशेष आध्यात्मिक अनुभव बन जाता है।

काशी और तुलसीदास जी का हनुमान भक्ति से जुड़ा संबंध

काशी में भगवान हनुमान के ये मंदिर केवल अलग-अलग पूजा स्थल नहीं हैं।

इनके पीछे तुलसीदास जी की भक्ति, साधना और श्रीराम के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा की स्मृतियां जुड़ी हुई बताई जाती हैं।

एक तरफ संकट मोचन मंदिर है, जहां हनुमान जी के दिव्य स्वरूप को तुलसीदास जी की साधना से जोड़ा जाता है।

दूसरी ओर बाल हनुमान मंदिर है, जहां उनके बाल स्वरूप की पूजा की जाती है।

तुलसी घाट पर गुफा वाले हनुमान हैं, जहां तुलसीदास जी की साधना स्थली की स्मृति मिलती है।

फिर कोड़िया हनुमान की कथा है, जिसमें भगवान के भक्तों के संकट दूर करने वाले स्वरूप को याद किया जाता है।

और प्रह्लाद घाट पर मनसा पूर्ण महामृत्युंजय हनुमान मंदिर है, जहां भक्त अपनी मनोकामनाओं के साथ पहुंचते हैं।

इन सभी मंदिरों को एक सूत्र में जोड़ता है—

भगवान श्रीराम के परम भक्त हनुमान और उनके अनन्य भक्त गोस्वामी तुलसीदास।

काशी में आज भी जब सुबह गंगा के घाटों पर आरती होती है, मंदिरों में घंटियां बजती हैं और गलियों में राम नाम सुनाई देता है, तब ऐसा लगता है जैसे यह नगरी अपने भीतर सदियों पुरानी भक्ति की परंपरा को आज भी संजोए हुए है।

और शायद यही काशी की सबसे बड़ी विशेषता है।

यहां समय बदलता है, पीढ़ियां बदलती हैं, लेकिन भक्ति की परंपरा बनी रहती है।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने भगवान श्रीराम की कथा को जन-जन तक पहुंचाया और उनकी भक्ति में हनुमान जी का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा।

इसीलिए काशी में उनसे जुड़े हनुमान मंदिरों की कथा आज भी श्रद्धालुओं के बीच सुनाई जाती है।

जब कोई भक्त संकट मोचन के सामने खड़ा होकर हाथ जोड़ता है, जब कोई तुलसी घाट पर गंगा की ओर देखकर राम नाम का जाप करता है, या जब कोई कोड़िया हनुमान के सामने अपनी परेशानी रखता है, तो उसके पीछे केवल एक पूजा नहीं होती।

उसके पीछे सदियों से चली आ रही आस्था और भक्ति की एक पूरी परंपरा होती है।

और यही कारण है कि काशी को केवल मोक्ष की नगरी नहीं, बल्कि राम और हनुमान की भक्ति से जुड़ी नगरी भी कहा जाता है।

जय श्रीराम।
जय बजरंगबली।

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