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जब हनुमान जी ने अपना सीना चीरकर दिखाए श्रीराम और माता सीता के दर्शन – अद्भुत कथा

श्रीराम और माता सीता के दर्शन

रामायण की कथाएं जितनी बार सुनी जाएं, उतनी ही बार मन को अपने भीतर खींच लेती हैं। इन कथाओं में केवल युद्ध, विजय और पराक्रम ही नहीं है, बल्कि ऐसी भक्ति भी है, जिसके सामने संसार की सबसे अनमोल वस्तुएं भी छोटी दिखाई देती हैं।

महाबली हनुमान इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं।

उनके लिए श्रीराम केवल उनके आराध्य नहीं थे। श्रीराम ही उनके जीवन का आधार थे। उनकी सेवा ही उनका धर्म थी और उनकी भक्ति ही उनका सबसे बड़ा धन।

इसी भक्ति से जुड़ी एक अत्यंत रोचक कथा है, जिसमें माता सीता द्वारा दिए गए एक अनमोल मोतियों के हार को हनुमान जी ने एक-एक करके तोड़ दिया था। जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने ऐसा क्यों किया, तो हनुमान जी ने ऐसा उत्तर दिया जिसने वहां मौजूद सभी लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया।

और जब लंका के राजा विभीषण ने उनकी भक्ति पर प्रश्न उठाया, तब हनुमान जी ने अपने सीने को चीरकर सभी को बता दिया कि उनके हृदय में वास्तव में कौन बसता है।

आइए, जानते हैं महाबली हनुमान की भक्ति से जुड़ी यह अद्भुत कथा।

रावण के अंत के बाद अयोध्या लौटे श्रीराम

लंका में रावण और श्रीराम के बीच हुआ भयंकर युद्ध समाप्त हो चुका था।

अधर्म का अंत हुआ और धर्म की विजय हुई।

रावण के वध के बाद श्रीराम ने विभीषण को लंका का राजा बनाया। विभीषण ने श्रीराम के प्रति अपनी निष्ठा और धर्म के मार्ग को अपनाकर यह सिद्ध कर दिया था कि जन्म से नहीं, बल्कि कर्म से व्यक्ति की पहचान होती है।

इसके बाद श्रीराम माता सीता, लक्ष्मण जी, हनुमान जी और अपने अन्य साथियों के साथ अयोध्या लौटे।

अयोध्या पहुंचने के बाद श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ और वे अयोध्या के राजा बने।

पूरी अयोध्या नगरी आनंद और उत्सव में डूब गई।

लंबे वनवास और कठिन परिस्थितियों के बाद श्रीराम के लौटने से अयोध्यावासियों के चेहरे पर प्रसन्नता थी।

लेकिन इस विजय के पीछे जिन लोगों ने अपना सर्वस्व लगा दिया था, श्रीराम उन्हें कभी नहीं भूल सकते थे।

वानर सेना ने युद्ध में उनका साथ दिया था।

लक्ष्मण जी उनके साथ हर परिस्थिति में खड़े रहे थे।

और महाबली हनुमान?

हनुमान जी ने तो श्रीराम के लिए अपने प्राणों की भी चिंता नहीं की थी।

माता सीता ने सभी को भेंट देने का निश्चय किया

एक दिन माता सीता ने उन सभी लोगों को सम्मानित करने का विचार किया, जिन्होंने लंका विजय में श्रीराम की सहायता की थी।

माता सीता ने सभी को उनकी सेवा और सहयोग के लिए अपनी ओर से भेंट देने का निश्चय किया।

जिसके लिए जो उचित था, माता सीता ने उसे वह भेंट दी।

धीरे-धीरे सभी की बारी आती गई।

लेकिन जब बात हनुमान जी की आई तो श्रीराम मुस्कुरा उठे।

श्रीराम ने माता सीता से कहा कि हनुमान जी को आखिर ऐसी कौन-सी वस्तु दी जा सकती है, जो उनकी सेवा और भक्ति का मूल्य चुका सके?

हनुमान जी ने जो कुछ किया था, उसके सामने कोई भी सांसारिक उपहार बहुत छोटा था।

उन्होंने समुद्र पार किया था।

माता सीता का पता लगाया था।

लंका में जाकर श्रीराम का संदेश पहुंचाया था।

लंकापुरी में रावण की शक्ति को चुनौती दी थी।

और युद्ध के दौरान लक्ष्मण जी के लिए संजीवनी बूटी लाने के लिए पूरा पर्वत उठा लाए थे।

ऐसी निस्वार्थ सेवा का मूल्य किसी आभूषण या धन से कैसे लगाया जा सकता था?

लेकिन माता सीता के मन में हनुमान जी के लिए कुछ देने की इच्छा थी।

वे चाहती थीं कि हनुमान जी को अपनी ओर से कोई ऐसी भेंट दें, जिसे वे प्रेम से स्वीकार करें।

श्रीराम और माता सीता के दर्शन

विभीषण लेकर आए एक अनमोल मोतियों का हार

इसी समय लंका के नए राजा विभीषण भी वहां उपस्थित थे।

रावण के वध के बाद श्रीराम ने स्वयं विभीषण का राज्याभिषेक किया था।

विभीषण श्रीराम के प्रति अत्यंत कृतज्ञ थे।

वे जानते थे कि श्रीराम ने केवल उनका साथ ही नहीं दिया, बल्कि उन्हें लंका का राजा बनने का अवसर भी दिया था।

इसी भावना से विभीषण ने श्रीराम को एक अत्यंत सुंदर और अनमोल मोतियों का हार भेंट किया।

वह हार बहुत सुंदर था।

उसमें चमकते हुए मोती जड़े हुए थे।

जब श्रीराम ने वह हार देखा, तो उन्होंने उसे माता सीता को दे दिया।

माता सीता को भी वह हार बहुत सुंदर लगा।

लेकिन तभी उनके मन में एक विचार आया।

उन्होंने सोचा कि यह हार किसी और को नहीं, बल्कि हनुमान जी को दिया जाना चाहिए।

माता सीता ने वह मोतियों का हार हनुमान जी को दे दिया।

वहां मौजूद सभी लोग यह देखकर प्रसन्न थे कि हनुमान जी को माता सीता की ओर से इतना सुंदर उपहार मिला है।

लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि अगले ही क्षण वहां क्या होने वाला है।

हनुमान जी ने मोतियों की माला तोड़ना शुरू कर दिया

हनुमान जी ने माता सीता की ओर से मिली उस माला को अपने हाथों में लिया।

उन्होंने उसे ध्यान से देखा।

फिर माला को एक तरफ से दूसरी तरफ घुमाकर देखने लगे।

वहां मौजूद लोगों को लगा कि शायद हनुमान जी माला की सुंदरता देख रहे हैं।

लेकिन अचानक हनुमान जी ने माला के एक मोती को अपने दांतों से तोड़ दिया।

उन्होंने उस मोती को ध्यान से देखा और फिर उसे जमीन पर फेंक दिया।

इसके बाद उन्होंने दूसरा मोती तोड़ा।

फिर तीसरा।

धीरे-धीरे हनुमान जी माला के मोतियों को एक-एक करके तोड़कर देखने लगे।

वहां मौजूद सभी लोग आश्चर्य से यह दृश्य देख रहे थे।

जिस माला की सुंदरता की सभी प्रशंसा कर रहे थे, हनुमान जी उसी माला को नष्ट कर रहे थे।

माता सीता भी हैरान रह गईं।

आखिर हनुमान जी ऐसा क्यों कर रहे थे?

क्या उन्हें माता सीता का दिया हुआ उपहार पसंद नहीं आया?

क्या उन्हें इस अनमोल माला का कोई मूल्य नहीं था?

या इसके पीछे कोई और कारण था?

श्रीराम और माता सीता के दर्शन

हनुमान जी ने कहा—जिसमें राम नहीं, वह मेरे लिए व्यर्थ है

माता सीता ने हनुमान जी से पूछा कि उन्होंने इतनी सुंदर माला को क्यों तोड़ दिया?

तब हनुमान जी ने बहुत ही सरल उत्तर दिया।

उन्होंने कहा कि इस माला में उन्हें प्रभु श्रीराम दिखाई नहीं दे रहे हैं।

हनुमान जी के लिए यह माला कितनी भी कीमती क्यों न हो, अगर उसमें उनके आराध्य श्रीराम का स्मरण नहीं था, तो उसका उनके लिए कोई मूल्य नहीं था।

उनके लिए संसार की सबसे कीमती वस्तु भी उस समय अर्थहीन थी, जब उसमें श्रीराम का नाम या उनकी स्मृति न हो।

हनुमान जी का भाव यही था कि—

जिस वस्तु में मेरे प्रभु नहीं हैं, वह मेरे लिए अनमोल कैसे हो सकती है?

उनकी बात सुनकर वहां मौजूद सभी लोग शांत हो गए।

यह उत्तर केवल एक उत्तर नहीं था।

यह हनुमान जी की भक्ति की गहराई थी।

उनके लिए सोना, मोती, राजसी वैभव या कोई भी सांसारिक वस्तु महत्वपूर्ण नहीं थी।

उनके लिए सबसे बड़ा धन था—

श्रीराम।

विभीषण ने पूछा—क्या आपके हृदय में भी श्रीराम हैं?

वहां लंका के राजा विभीषण भी मौजूद थे।

उन्होंने हनुमान जी को माला के मोती तोड़ते हुए देखा और उनकी बात भी सुनी।

लेकिन विभीषण के मन में एक प्रश्न उठा।

अगर हनुमान जी हर वस्तु में श्रीराम को देखना चाहते हैं, तो क्या उनके अपने हृदय में भी श्रीराम हैं?

कथा के अनुसार, विभीषण ने हनुमान जी से प्रश्न किया—

क्या तुम्हारे हृदय में भी प्रभु श्रीराम हैं?

यह प्रश्न सुनते ही वहां का वातावरण जैसे अचानक बदल गया।

हनुमान जी ने विभीषण की ओर देखा।

उनके चेहरे पर क्रोध नहीं था।

बल्कि उनकी आंखों में अपने आराध्य के प्रति अपार प्रेम था।

उन्होंने कोई लंबा उत्तर नहीं दिया।

उन्होंने अपनी भक्ति को शब्दों से साबित करने के बजाय उसे स्वयं दिखाने का निर्णय लिया।

और फिर जो हुआ, उसे देखकर वहां मौजूद सभी लोग आश्चर्यचकित रह गए।

हनुमान जी ने अपना सीना चीरकर कराए श्रीराम-सीता के दर्शन

महाबली हनुमान ने अपने सीने पर हाथ रखा।

और फिर उन्होंने अपना सीना चीर दिया।

वहां उपस्थित सभी लोगों की आंखें उस दृश्य पर टिक गईं।

हनुमान जी के हृदय में प्रभु श्रीराम और माता सीता के दर्शन हो रहे थे।

जिस बात को हनुमान जी अभी तक शब्दों में समझा रहे थे, अब वह सबके सामने प्रत्यक्ष थी।

उनके लिए श्रीराम केवल मंदिर में विराजमान भगवान नहीं थे।

वे उनके हृदय में बसते थे।

उनकी हर सांस में राम थे।

उनके हर कर्म में राम थे।

उनकी भक्ति में राम थे।

उनके जीवन का उद्देश्य ही श्रीराम की सेवा था।

वह दृश्य देखकर वहां उपस्थित सभी लोग भाव-विभोर हो गए।

विभीषण भी हनुमान जी की भक्ति देखकर नतमस्तक हो गए।

माता सीता के लिए भी यह दृश्य अत्यंत भावुक कर देने वाला था।

और श्रीराम तो पहले से ही जानते थे कि हनुमान जी के हृदय में उनके लिए कैसी भक्ति है।

श्रीराम और माता सीता के दर्शन

हनुमान जी के लिए सबसे बड़ा धन क्या था?

इस कथा का सबसे सुंदर पक्ष यही है कि हनुमान जी के लिए संसार का कोई भी धन श्रीराम की भक्ति से बड़ा नहीं था।

माता सीता ने उन्हें जो हार दिया था, वह अत्यंत मूल्यवान था।

लेकिन हनुमान जी ने उसे केवल इसलिए स्वीकार नहीं किया कि वह महंगा या सुंदर था।

उन्होंने उसे इसलिए परखा कि क्या उसमें उनके आराध्य का स्मरण है?

जब उन्हें वहां श्रीराम दिखाई नहीं दिए, तो उन्होंने उसे अपने लिए व्यर्थ समझा।

यह हनुमान जी की भक्ति की उस भावना को दिखाता है, जिसमें भक्त और भगवान के बीच कोई सांसारिक वस्तु नहीं रह जाती।

उनके लिए श्रीराम ही सब कुछ थे।

यही कारण है कि हनुमान जी को रामभक्त हनुमान कहा जाता है।

उनका नाम लेते ही सबसे पहले श्रीराम की भक्ति का स्मरण होता है।

हनुमान जी की भक्ति हमें क्या सिखाती है?

यह कथा हमें भक्ति का एक बहुत सुंदर अर्थ समझाती है।

भक्ति केवल पूजा करने या भगवान का नाम लेने का नाम नहीं है।

भक्ति का अर्थ है अपने आराध्य के प्रति ऐसी निष्ठा, जिसमें स्वार्थ पीछे छूट जाए और समर्पण सबसे आगे आ जाए।

हनुमान जी ने श्रीराम के लिए कभी अपने सुख की इच्छा नहीं की।

उन्होंने श्रीराम की सेवा को ही अपना सौभाग्य माना।

समुद्र पार करना हो, लंका जाना हो, माता सीता का पता लगाना हो या युद्ध में श्रीराम की सहायता करनी हो—हनुमान जी हर परिस्थिति में उनके साथ खड़े रहे।

उनकी शक्ति का रहस्य भी यही था कि उन्हें अपने बल पर नहीं, बल्कि अपने प्रभु पर विश्वास था।

मोतियों की माला वाली कथा में भी यही भाव दिखाई देता है।

दुनिया के लिए वह हार कीमती था।

लेकिन हनुमान जी के लिए उसकी कीमत तभी थी, जब उसमें श्रीराम की स्मृति होती।

और जब विभीषण ने उनके हृदय पर प्रश्न किया, तो हनुमान जी ने अपने जीवन का सबसे बड़ा सत्य सबके सामने रख दिया।

उनके हृदय में केवल श्रीराम और माता सीता का स्थान था।

महाबली हनुमान की यह कथा केवल एक चमत्कार की कहानी नहीं है।

यह उस भक्ति की कहानी है, जिसमें भक्त अपने आराध्य को संसार की हर वस्तु से ऊपर रखता है।

माता सीता का दिया हुआ अनमोल मोतियों का हार भी हनुमान जी के लिए उस समय मूल्यहीन हो गया, जब उसमें उन्हें श्रीराम का दर्शन नहीं हुआ।

और जब उनकी भक्ति पर प्रश्न उठाया गया, तो उन्होंने शब्दों से नहीं बल्कि अपने हृदय से उत्तर दिया।

उनका संदेश बिल्कुल स्पष्ट था—

जहां राम हैं, वही हनुमान का संसार है।

इसीलिए आज भी जब भक्त भगवान हनुमान का स्मरण करते हैं, तो उनके साथ श्रीराम का नाम अपने आप जुड़ जाता है।

जय श्रीराम।
जय बजरंगबली। 🙏

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